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शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

समय मानव और कर्म

कल
का भरोसा जो करे समझो वो काल से
डरे वर्तमान की लाठी पकड़ जो चले
काल उससे डरे मत उलझ तू जीवन के जंजाल मे एक धोखा है ये जीवन मृत्यु अटल है जोड़ा बहुत तोड़ा बहुत अब तो संभल जा तेरे लिये इक कफन ही बहूत है पुण्य के सलिल मे पाप का आज तर्पण कर दो दिनो के यौवन के बाद बाट जोहता तेरा जर संभल कर चल कौन जाने कैसा होगा तेरा कल साथ तेरे जो खड़े वे तो पुतले छाया के लोभी लालची वर है तेरी माया के दीन दुखियो मे ढूंढ जरा नारायण को जो लिया था चुका दे उस सृष्टि कर्ता के ऋण को भाग मत उस तिमिर से जो विषमता से बना आग कि लपटो मे सिक स्वर्ण कुंदन बना लड़ ले आज समय से जीत जा ये रण जाग जा वरना मृत्यु कर लेगी वरण

गुरुवार, 29 सितंबर 2011

एक कोशिश गजल लिखने कीएक कोशिश गजल लिखने की

जी रहे है उस आस मे जब अंधेरा साथ छोड़ देगा जब चलेगे उजाले की और जमाना साथ छोड़ देगा मंजिलो की तलाश मे दूर बहुत निकल आया हुँ मै करता नही कभी कशति पर भरोसा क्योकी किनारा साथ छोड़ देगा अब शिकायत क्या करे हम वो खुद गुनाहागार थे दिखा कर रोशनी मोहबब्त की फिर अंधेरो मे छोड़ देगा गम की दहलीज पर रख कदम वक्त से लड़ने लगे आज भले वो साथ मेरे कल भँवर मे छोड़ देगा लड़ रहे थे दो मुसाफिर बस एक इमान पर जो कराता था सुलह इनमे खुद घरौँदे तोड़ देगा

सोमवार, 26 सितंबर 2011

उजाले की ओर

उजाले की ओर
चला हूँ आतीत के अंधेरे भी साथ है रात
तो काली है पर तारे मेरे साथ है कोई
भले कहे कुछ रोशनी ले लो पर मुझे
मालूम है कल पूनम की रात है
डरता नही हुँ विपत्तियो के प्रेतो से
मेरा संकल्प अब भी मेरे साथ ह छोड़ने को आतुर है मेरा अनुभव साथी किस्मत की अब ये औकात मेरे मानस को आँख दिखाती पूजता था अब तलक जिन पत्थरो को वो पत्थर ही बने रहे लेकिन सौतन श्रद्धा अब भी मन से नही जाती कुछ हँस रहे है देख कर जो वासना के पति है माया जिनके खोखले दिलो मे बरसो से डटी है मैरे साथ हो लो जीवन का रस मिलेगा पर याद रख आखिर दोजख मे ही जलना पड़ेगा ये देख कर ही आँख मेरी बंद है और चला जा रहा हुँ नये उदय की और कहीँ मिली मानवता तो कहुगा ढूँढ ले नया ठौर

बुधवार, 21 सितंबर 2011

गरीबदास का दर्द

पेट पीठ से लगा हुआ और मिट्टी मे सना हुआ है श्रम से कुंदन सा तपा हुआ है और लाचारी के आगे झुका हुआ है दरिद्र नरायण ना म रखा है यथार्थ है दरिद्रता और नारायण रूठा हुआ है काला चेहरा तन काला है बाँट रहा अमृत लेकिन मिलती उसको हाला है कर्तवयनिष्ठ हो कर विकास यही उसने ठाना है एहसान फरामोश पूँजीवादी उप कैसा जमाना है सरकारी आँकड़े सा जीवन और समर्पण सुविधाओ का केवल आंडबर निर्वस्त्र लुटा पिट शोषित कुपोषित फिर भी कैसे जीवित ये भला निरक्षर उन ज्ञानी से जो इन्हे बैकबड कहते है पर भूल जाते है इनके इशारो से ही विकास के पहिये चलते है इनका सच सच नही लगता सरकार का धोखा लगता है भारत मे गरीब जिँदगी मे नही फाइलो मे तरक्की करता है गरीबी मिटाओ ये नारा बेमानी है प्रजापालक की आँखो मे ना शर्म है ना पानी है