भारत की सपंन्नता की चकाचौध से सारा विश्र्व ईष्या करता है अगर इतिहास के पन्ने पलट कर मनन करे तो हम ये सोचने को मजबूर हो जायेगे की भारत के तथाकथित डालर प्रेमी अंग्रेजो के चाटुकार भ्रष्ट राजनीति पनारे के कृमि भारत को विकासशील देशो की पंक्ति मे क्यो खड़ा कर अपनी संपन्नता को धुंधला कर रहे है आखिर भारत विकासशील
देशो की कतार मे कब तक
खड़ा रहेगा क्या नही है मेरे देश मेँ
श्रम शक्ति अपार खनिज
संपदा की भरमार प्राकृतित
संपदा अपार गंगा यमुना की शीतल
जल धाराये संदृण हमारी सेनाये
सोना उगलती वंसुधरा वेदो का उच्चतम
ज्ञान पृथ्वी अग्नि जैसे आयुध चरक ओर सुश्रत का चिकित्सा विज्ञान आर्यभट्ट जैसे गणितज्ञ और सबसे
खास बात हम भारतीयो मे अपने देश के
स्वाभिमान को बचाने के लिये मर
मिटने
का संकल्प...क्या इतना काफी नही एक
विकसित राष्ट्र के लिये भारत की वो संपन्नता कहाँ गई जिसके सम्मोहन मे संमदर पार से सिँकदर, मुगल साम्राज्य और 300 साल से भी अधिक भारतीय संपदा का दोहन करने वाले डच पुर्तगाल फ्रांसिसी और ब्रिटिश भारत का तन मन धन लूटते रहे लेकिन भारत की संपन्नता मे फिर भी कमी न आई लेकिन अंग्रेजो की शिक्षा व्यवहार और संस्कृति भारतीयो को लाचर जरूर बना गई और ये लाचारी ही भारत की दुर्दशा का मुख्य कारण है भले 15 अगस्त 1947 को देश की सत्ता का हंस्तातरण कर के चले गये किँतु भारत को मानसिक गुलाम बना कर छोड़ गये और भारत सिर्फ एक कोरा कागज बन गया जिस पर जैसा चाहो लिख डालो भारत की संपन्नता अभी भी उतनी ही है जो पहले थी बस उसको सहेजने और सदुपयोग की आवशकता है भारत को विकसित भले न हम बना पाये किँतु भ्रष्टाचार कुपोषण जातिवाद प्राँतवाद सामाजिक बुराईया अशिक्षा सेकुलरवाद नक्सलवाद आंतकवाद जैसी राक्षसी प्रवृत्ति को मिटाने का कारगार उपाय करेगे तो भारत का विकास पथ खुद ही बन जायेगा...सड़को पर चिल्लाने या संसद मे हंगामा करने से विकसित नही हो सकते अगर देश और समाज यृँ ही निद्राग्रस्त रहा तो मुमकिन हो कोई सिँकदर या मुगल या अंग्रेज भारत पर आंखे गड़ाये बैठा है....वंदे मातरम
मंगलवार, 8 मई 2012
सोमवार, 7 मई 2012
राष्ट्र धर्म और संस्कृति
राष्ट्रवाद का जन्म धर्म और संस्कृति के मिलन से होता है इसका एक अर्थ यह भी कह सकते है राष्ट्र अगर शरीर है तो धर्म उसकी आत्मा और संस्कृति उस्की वेँ तंत्रिकाये है जो संचालित करती है राष्ट्र धर्म और संस्कृति का समभाव ही किसी भी राष्ट् की उन्नती और विकास की नीँव है किँतु सेकुलरवाद इस सिँद्धात को नकारता है क्योकी सेकुलर धर्म विहिन और संस्कृति मे विकृति पैदा कर के राष्ट्रवाद का मिथ्या रूप बना कर प्रस्तुत करते है और राष्ट्र धर्म ओर संस्कृति को खंडित करते रहते है ताकि सत्ता को अपनी मुठ्ठी मेँ जकड़ कर रख सके आजादी के उपरांत सेकुलरवादियो एंव कम्नुयटो के कुचक्र ने राष्ट धर्म और संस्कृति को विँकलाग कर रखा है जब राष्ट धर्म और संस्कृति का ये हाल होगा तो जनक्रांति कैसे संभव होगी क्योकी जनमानस के पटल पर राष्ट्र धर्म और संस्कृति कि परिभाषाये भिन्न भिन्न लिख डाली है इंडिया इंडिया चिल्लाने वाला भला भारतीय धर्म और संस्कृति को क्या जानेगा जिनक रोम रोम मे रोम बसा हो वो राम को क्या जानेगा जब राम को नही जानेगा तो राम राज्य कैसे होगा जब राम को नही जानेगा तो बुराइयो का संहार कैसे होगा जब राम को नही जानेगा तो फिर समाज मे समता का भाव कैसे आयेगा राम को धर्म की रीढ कहना सर्वथा उचित है और धर्म की मजबूती राष्ट्र की मजबूती है और अगर राष्ट मजबूत होगा तो कोई भी पर संस्कृति और मैकालेवाद हमारी संस्कृति पर वज्रपात नही कर सकती जो अपने राष्ट्र संस्कृति को अपनी संपत्ती की तरह रखते है उसका अवमूल्यन नही होने देते वे कभी राष्ट्रद्रोही नही बनते चाहे वो किसी भी पंथ का अनुसरण करते हो भारत मे श्री एपीजे कलाम जैसा वयक्तितव एक ठोस उदाहरण है जो राष्ट्र धर्म और संस्कृति मे पूर्णता आस्था रखते है जो सेकुलवादियो के मुँह पर तमाचा हैँ....जय माँ भारती
शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012
तुम ऐसा करना
विचार भले ना मिले हमारे.पर देश राह पर मिल जाना .अगर भटक जाऊ पथ से दीपक तुम दिखला देना.साथ मेरे बस साहस है तुम उर्जा मेरी बन जाना. भारत के भाल पर जो निशान बैरी ने दागे है .धरा स्वर्ग पर जिसने बहाये रक्त पनाले है .खड़ग उठा तुम उन भीरू के शीश भूमि पर चढा देना.धर्म आँच पर आये तो सिँहनाद तुम कर देना. कुरुक्षेत्र और गीता का मन मे सुमरन कर लेना.मर जाना रण मे पर पाप हरण तुम कर लेना.मोह अगर रोके तुमको तो मातृभूमि को याद करो.विचलित हो मन तो सत्य की टंकार करो .वीर प्रसूता के रक्त ऋण को आज चुका देना.रंगे सियार और कुत्ते घात लगाये बैठे है सत्ता के मद मे कर्णधार देश के ऐँठे है.आज उन्हे देश प्रेम का पाठ पढा देना.विरोधियो के हाथ उठे है देश की पंरपराओ पर अंधकार पश्चिम का छाय आर्य संतानो पर .वेद प्रकाश की ज्योति से उस तिमिर का अंत कर देना. महाशक्ति हो भारत विश्व की बस संकल्प यही हो .राष्ट्रवाद ही जागे समाज मे लक्षय यही हो .भारत को फिर से तुम वैदिक पथ पर ले जाना..,.वंदेमातरम
मंगलवार, 17 अप्रैल 2012
गांधी महात्मा नही थे
इतिहास ने गांधी का जिस तरह
महिमा मंडन किया ऐसा प्रतित
होता है वो इतिहास को लिखने वाले
भारतिय नही अंग्रेजो के दलाल रहे
होगे मोहन दास करमचंद गांधी वैसे
तो स्वदेशी की बात करते थे
लेकिन आजादी के बाद भी नंपुसक
की भाँति जिये और मुस्लिम
तुष्टीकरण करते रहे क्या ये
महात्मा के लक्षण है जब सारा देश
गांधी का भक्त था तो पाकिस्तान
क्यो बना क्या गांधी एक कमजोर
लाचार बूढा बन कर रह गया था गांधी वैसे तो गौ हत्या शराबबंदी और हिँदी पर जोर देते नही थकते थे किँतु जैसे है आजादी मिली(सत्ता हंस्तान्तरण) हुआ गांधी मुस्लिम लीग और जिन्ना की चापलूस करने लगे जबकी जिन्ना के पक्ष मे कुछ गद्दार धंमाध मुसलमान थे और गांधी के साथ पूरा देश खड़ा था फिर भी गांधी असहाय क्या एक महात्मा का यही सिँधात है अंहिसा का फटा ढोल पीटने वाले गांधी को हिँदुओ पर हुये अत्याचार कभी नही दिखे उसके लिये अल्पसंखयक ही भगवान थे ऐसे महात्मा को मार दिया गया तो क्या गलत हुआ
महिमा मंडन किया ऐसा प्रतित
होता है वो इतिहास को लिखने वाले
भारतिय नही अंग्रेजो के दलाल रहे
होगे मोहन दास करमचंद गांधी वैसे
तो स्वदेशी की बात करते थे
लेकिन आजादी के बाद भी नंपुसक
की भाँति जिये और मुस्लिम
तुष्टीकरण करते रहे क्या ये
महात्मा के लक्षण है जब सारा देश
गांधी का भक्त था तो पाकिस्तान
क्यो बना क्या गांधी एक कमजोर
लाचार बूढा बन कर रह गया था गांधी वैसे तो गौ हत्या शराबबंदी और हिँदी पर जोर देते नही थकते थे किँतु जैसे है आजादी मिली(सत्ता हंस्तान्तरण) हुआ गांधी मुस्लिम लीग और जिन्ना की चापलूस करने लगे जबकी जिन्ना के पक्ष मे कुछ गद्दार धंमाध मुसलमान थे और गांधी के साथ पूरा देश खड़ा था फिर भी गांधी असहाय क्या एक महात्मा का यही सिँधात है अंहिसा का फटा ढोल पीटने वाले गांधी को हिँदुओ पर हुये अत्याचार कभी नही दिखे उसके लिये अल्पसंखयक ही भगवान थे ऐसे महात्मा को मार दिया गया तो क्या गलत हुआ
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